
शरद ऋतु · 13 नवंबर 2026 – 16 नवंबर 2026
छठ पूजा
सूर्यषष्ठी · सूर्य और छठी मैया की आराधना
पर्व विवरण
परिचय
ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः
छठ पूजा सूर्य और उनकी शक्ति छठी मैया को समर्पित चार दिन का कठिन व्रत है, जिसमें व्रती छत्तीस घंटे निर्जल रहकर नदी या तालाब के जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
उत्पत्ति
छठ की जड़ें वैदिक सूर्य उपासना में हैं — ऋग्वेद के सूर्य सूक्त और उषा की स्तुतियाँ इसका आधार हैं। यह उन विरल व्रतों में है जिसमें कोई पुरोहित, मंत्र-विशेषज्ञ या मंदिर आवश्यक नहीं; व्रती स्वयं जल में खड़े होकर सीधे सूर्य को अर्घ्य देता है। छठी मैया को षष्ठी देवी या उषा का रूप माना जाता है, जो संतान की रक्षिका हैं। यह पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा है, और अब प्रवासी समाज के साथ देश-विदेश तक पहुँच चुका है।
क्यों मनाया जाता है
छठ कृतज्ञता का पर्व है — सूर्य ही ऊर्जा, अन्न, स्वास्थ्य और जीवन का स्रोत हैं, और यह व्रत उन्हें लौटाया गया धन्यवाद है। डूबते सूर्य को पहले अर्घ्य देने की परंपरा अनूठी है; यह सिखाती है कि जो अस्त हो रहा है, उसका भी उतना ही आदर होना चाहिए जितना उदय होते का। शुद्धता इसका प्राण है — नए वस्त्र, मिट्टी के चूल्हे पर बना प्रसाद, बिना चखा ठेकुआ, और घाट तक नंगे पाँव जाना। इसमें जाति, वर्ग और लिंग का कोई भेद नहीं; घाट पर सब एक पंक्ति में खड़े होते हैं, और मान्यता है कि इस व्रत से संतान की रक्षा और परिवार की समृद्धि होती है।
कथा
सबसे प्रचलित पौराणिक कथा राजा प्रियव्रत की है। उन्हें बहुत समय तक संतान न हुई; महर्षि कश्यप के यज्ञ से रानी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, पर वह मृत था। शोक में डूबे राजा के समक्ष ब्रह्मा की मानसपुत्री देवसेना अर्थात् षष्ठी देवी प्रकट हुईं और कहा कि वे सृष्टि की रक्षिका हैं; यदि राजा उनका विधिपूर्वक पूजन करें तो संतान जीवित होगी। राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रत और पूजन किया और पुत्र को जीवन मिला — तभी से षष्ठी देवी छठी मैया के रूप में पूजित हुईं। दूसरी परंपरा महाभारत से है, जिसमें द्रौपदी और पांडवों ने ऋषि धौम्य के परामर्श से सूर्य की उपासना कर संकट और रोग से मुक्ति तथा राज्य की पुनःप्राप्ति की।
कहानियाँ और प्रसंग
सूर्यपुत्र कर्ण की कथा इस पर्व से गहराई से जुड़ी है — वे प्रतिदिन जल में कमर तक खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और तब तक किसी याचक को खाली हाथ न लौटाते थे; अंग देश अर्थात् आज के भागलपुर क्षेत्र में यह परंपरा उनसे जोड़ी जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद अयोध्या लौटते समय सीता ने मुंगेर में सूर्य की उपासना कर छठ व्रत किया, और वहाँ सीता चरण आज भी दर्शनीय है। चार दिन का क्रम अपने आप में कथा है — नहाय-खाय के दिन स्नान और सात्विक भोजन, खरना के दिन दिन भर उपवास के बाद संध्या को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य में डूबते सूर्य को नारियल, ठेकुआ और ऋतु फलों से भरा सूप अर्पण, और चौथे दिन उषा अर्घ्य में उगते सूर्य को अर्घ्य देकर पारण। घाट पर गाए जाने वाले "कांच ही बांस के बहंगिया" जैसे लोकगीत इस पर्व की स्मृति को पीढ़ियों तक ले जाते हैं।
विधि एवं परंपरा
नहाय-खाय में स्नान, नए वस्त्र और लौकी-चने की दाल; खरना में दिन भर उपवास और संध्या को गुड़ की खीर का प्रसाद; ३६ घंटे का निर्जल व्रत; बाँस के सूप और दउरा में ठेकुआ, नारियल, गन्ना, केला और ऋतु फल; नदी या तालाब में खड़े होकर संध्या तथा उषा अर्घ्य; कोसी भराई और घाट पर दीप; छठ के लोकगीत।
कहाँ मनाया जाता है
बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल का मिथिला क्षेत्र; प्रवासी समाज के साथ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और विदेशों तक।
