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Sanatana Gyan
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गीता ज्ञान · श्रीमद्भगवद्गीता

जीवन के हर प्रश्न का एक शाश्वत उत्तर।

श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में छिपे ज्ञान को पढ़ें, समझें और अपने जीवन में उतारें।

“

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ।

१८.६६
१८ अध्याय

अध्याय अनुसार ज्ञान

अठारह अध्यायों में जीवन, कर्तव्य, भक्ति और आत्मज्ञान की संपूर्ण यात्रा।

01

विषाद योग

अध्याय १ · Arjuna Vishada Yoga

→

02

सांख्य योग

अध्याय २ · Sankhya Yoga

→

03

कर्म योग

अध्याय ३ · Karma Yoga

→

04

ज्ञान कर्म संन्यास योग

अध्याय ४ · Jnana Karma Sannyasa Yoga

→

05

कर्म संन्यास योग

अध्याय ५ · Karma Sannyasa Yoga

→

06

ध्यान योग

अध्याय ६ · Dhyana Yoga

→

07

ज्ञान विज्ञान योग

अध्याय ७ · Jnana Vijnana Yoga

→

08

अक्षर ब्रह्म योग

अध्याय ८ · Akshara Brahma Yoga

→

09

राजविद्या राजगुह्य योग

अध्याय ९ · Raja Vidya Raja Guhya Yoga

→

10

विभूति योग

अध्याय १० · Vibhuti Yoga

→

11

विश्वरूप दर्शन योग

अध्याय ११ · Vishwarupa Darshana Yoga

→

12

भक्ति योग

अध्याय १२ · Bhakti Yoga

→

13

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

अध्याय १३ · Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga

→

14

गुणत्रय विभाग योग

अध्याय १४ · Gunatraya Vibhaga Yoga

→

15

पुरुषोत्तम योग

अध्याय १५ · Purushottama Yoga

→

16

दैवासुर सम्पद् विभाग योग

अध्याय १६ · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

→

17

श्रद्धात्रय विभाग योग

अध्याय १७ · Shraddhatraya Vibhaga Yoga

→

18

मोक्ष संन्यास योग

अध्याय १८ · Moksha Sannyasa Yoga

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प्रसिद्ध श्लोक

जीवन बदलने वाले श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते
अध्याय 2 · श्लोक ४७

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कर्मण्येवाधिकारस्ते

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं।

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योगः कर्मसु कौशलम्
अध्याय 2 · श्लोक ५०

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योगः कर्मसु कौशलम्

योगः कर्मसु कौशलम्॥

कर्म में कुशलता ही योग है।

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उद्धरेदात्मनात्मानं
अध्याय 6 · श्लोक ०५

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उद्धरेदात्मनात्मानं

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं।

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यदा यदा हि धर्मस्य
अध्याय 4 · श्लोक ०७

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यदा यदा हि धर्मस्य

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं प्रकट होता हूँ।

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