
अध्याय 6 · ध्यान योग · ०५
उद्धरेदात्मनात्मानं
श्लोक का मनन
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
सरल अर्थ
मनुष्य को अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं।
भावा��्थ
हमारे विचार और आदतें ही हमारे सबसे बड़े सहायक या बाधा बनते हैं।
जीवन में उदाहरण
हर दिन थोड़े समय का ध्यान और आत्मचिंतन मन को अपना मित्र बनाता है।
