
अध्याय 4 · ज्ञान कर्म संन्यास योग · ०७
यदा यदा हि धर्मस्य
श्लोक का मनन
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
सरल अर्थ
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं प्रकट होता हूँ।
भावा��्थ
धर्म सत्य, करुणा और संतुलन का जीवित सिद्धांत है, जो हर युग में पुनः जागृत होता है।
जीवन में उदाहरण
अन्याय के सामने सत्य बोलना अपने छोटे संसार में धर्म को जीवित रखना है।
