परिचय
ॐ गं गणपतये नमः
गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता गणेश का जन्मोत्सव है। दस दिन तक घरों और पंडालों में उनकी प्रतिमा स्थापित होती है, और अनंत चतुर्दशी को "गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" के उद्घोष के साथ विसर्जन होता है।
उत्पत्ति
गणेश जन्म की कथा शिव पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और गणेश पुराण में आती है, और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को उनका प्रादुर्भाव दिवस माना गया है। सार्वजनिक उत्सव की परंपरा महाराष्ट्र में पेशवाओं के काल में पनपी, जब शिवाजी और आगे चलकर पेशवा परिवार ने गणेशोत्सव को राजकीय आयोजन बनाया। १८९३ में लोकमान्य तिलक ने इसे घर की चारदीवारी से निकालकर सार्वजनिक पंडालों में स्थापित किया, जिससे यह समाज को जोड़ने और स्वतंत्रता की चेतना जगाने का माध्यम बन गया।
क्यों मनाया जाता है
गणेश प्रथम पूज्य हैं — कोई भी कार्य, विवाह, गृहप्रवेश, यात्रा या ग्रंथ का आरंभ उनके स्मरण से होता है, क्योंकि वे बुद्धि, विवेक और मंगल के अधिष्ठाता हैं। उनका स्वरूप ही उपदेश है — बड़े कान अधिक सुनने के लिए, छोटी आँखें एकाग्रता के लिए, बड़ा उदर सब पचा जाने की क्षमता, और मूषक वाहन यह कि छोटी इच्छाओं पर नियंत्रण चाहिए। दस दिन का यह उत्सव समाज को एक आँगन में लाता है, और मिट्टी की प्रतिमा का जल में विसर्जन सिखाता है कि जो आया है वह लौटेगा — आसक्ति नहीं, भाव शेष रहता है।
कथा
एक बार पार्वती स्नान के लिए गईं और द्वार पर पहरा देने वाला कोई न था। उन्होंने अपने उबटन और चंदन से एक सुंदर बालक की रचना की, उसमें प्राण फूँके और कहा कि किसी को भीतर न आने देना। कुछ समय बाद शिव लौटे, बालक ने उन्हें रोक दिया। परिचय और अधिकार के विवाद में शिव क्रोधित हो उठे और त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। पार्वती को जब यह ज्ञात हुआ, उनका शोक और क्रोध प्रलय जैसा हो गया; उन्होंने कहा कि पुत्र जीवित हो, अन्यथा सृष्टि नहीं रहेगी। शिव ने गणों को आदेश दिया कि उत्तर दिशा में जो पहला जीव मिले, उसका सिर ले आएँ — वह एक गजशिशु था। उस मस्तक से बालक पुनर्जीवित हुआ, और शिव ने उसे अपने गणों का अधिपति — गणपति — बनाकर वरदान दिया कि किसी भी कार्य में सबसे पहले उसका पूजन होगा।
कहानियाँ और प्रसंग
गणेश की कथाएँ बुद्धि की विजय की कथाएँ हैं। जब व्यास को महाभारत लिखने के लिए लेखक चाहिए था, गणेश ने अपना दाँत तोड़कर लेखनी बनाई और अखंड लेखन किया — इसीलिए वे एकदंत कहलाते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा की प्रतियोगिता में कार्तिकेय मोर पर निकल पड़े, पर गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा कर कहा कि मेरा संसार यहीं है, और आम का फल जीत लिया। चंद्रमा ने उनके रूप का उपहास किया तो शाप पाया, और क्षमा माँगने पर यह विधान बना कि गणेश चतुर्थी की रात चंद्र दर्शन वर्जित है। कुबेर अपने वैभव के अभिमान में उन्हें भोजन पर बुलाए, और गणेश उसका सारा भंडार खाकर भी अतृप्त रहे — तब शिव ने मुट्ठी भर भुने चावल देकर उन्हें तृप्त किया, यह सिखाते हुए कि भाव ही भोग है। परशुराम से युद्ध में उनका दाँत टूटने की कथा भी इसी परंपरा में आती है।
विधि एवं परंपरा
मिट्टी की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और षोडशोपचार पूजन; दूर्वा, शमी पत्र, लाल पुष्प और सिंदूर अर्पण; मोदक, लड्डू, पूरणपोळी और नारियल का भोग; अथर्वशीर्ष, गणपति स्तोत्र और आरती "सुखकर्ता दुखहर्ता"; प्रतिदिन आरती और अनंत चतुर्दशी को शोभायात्रा के साथ विसर्जन।
कहाँ मनाया जाता है
महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना और तमिलनाडु में प्रमुख; मुंबई का लालबागचा राजा और पुणे का दगडूशेठ प्रसिद्ध; उत्तर भारत में घरों में विनायक चतुर्थी।

