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गुरु पूर्णिमा
वर्षा ऋतु · 29 जुलाई 2026

गुरु पूर्णिमा

गुरुपूर्णिमा · गुरु के प्रति कृतज्ञता

पर्व विवरण
इस वर्ष की तिथि

29 जुलाई 2026

कब

आषाढ़ पूर्णिमा

अवधि

१ दिन

आराध्य देव
शिवविष्णु
परिचय

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः

गुरु पूर्णिमा उस दिन का नाम है जब शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं, क्योंकि इसी दिन वेदों के संपादक और महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था।


उत्पत्ति

परंपरा कहती है कि इसी पूर्णिमा को शिव ने सप्तऋषियों को योग का प्रथम उपदेश दिया और आदि गुरु — दक्षिणामूर्ति — कहलाए। दूसरी धारा इसे व्यास जयंती मानती है; वे पराशर और सत्यवती के पुत्र थे, जिन्होंने एक अखंड वेद को ऋक्, यजुः, साम और अथर्व में विभाजित किया, अठारह पुराण रचे और महाभारत गणेश को लिखवाया — इसीलिए वे वेद व्यास कहलाए। बौद्ध परंपरा में इसी दिन बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया, और जैन परंपरा में महावीर ने अपना प्रथम शिष्य स्वीकार किया।

क्यों मनाया जाता है

गुरु शब्द का अर्थ है वह जो अंधकार हटाता है — "गु" अंधकार, "रु" निवारण। सनातन दृष्टि में ज्ञान पुस्तक से नहीं, जीवित परंपरा से मिलता है, इसलिए गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान माना गया। आषाढ़ पूर्णिमा को चुनने का कारण भी है — इसके बाद वर्षा ऋतु आती है, जब संत और साधु एक स्थान पर चातुर्मास व्रत करते हैं और चार मास तक अध्ययन, उपदेश और साधना चलती है। इस प्रकार यह पर्व सीखने के मौसम का द्वार है।

कथा

व्यास की कथा असाधारण है। सत्यवती और ऋषि पराशर के पुत्र के रूप में यमुना के द्वीप पर जन्म लेने के कारण वे कृष्ण द्वैपायन कहलाए, और जन्म से ही ज्ञान संपन्न थे। उन्होंने देखा कि कलियुग में मनुष्य की स्मृति और आयु क्षीण होगी, तो एक विशाल वेद को चार भागों में बाँटकर चार शिष्यों — पैल, वैशंपायन, जैमिनि और सुमंतु — को सौंप दिया, जिससे ज्ञान सुरक्षित रह सके। महाभारत रचते समय उन्हें ऐसा लेखक चाहिए था जो उनकी गति से लिख सके; गणेश ने यह शर्त पर स्वीकारा कि लेखनी न रुके, और व्यास ने प्रतिशर्त रखी कि गणेश बिना समझे कुछ न लिखें — इसलिए बीच-बीच में उन्होंने कूट श्लोक रचे। शिष्यों ने इसी पूर्णिमा को उनका पूजन किया, और वही परंपरा गुरु पूर्णिमा बनी।

कहानियाँ और प्रसंग

गुरु-शिष्य परंपरा की कथाएँ इस दिन दोहराई जाती हैं। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मृण्मूर्ति बनाकर स्वयं धनुर्विद्या सीखी और गुरु के कहने पर अपना अंगूठा दे दिया — श्रद्धा की चरम सीमा। उद्दालक के पुत्र आरुणि ने खेत का पानी रोकने के लिए स्वयं मेड़ में लेट गए, तब गुरु ने उन्हें उद्दालक नाम दिया। कृष्ण और बलराम ने सांदीपनि के आश्रम में लकड़ियाँ बटोरीं, यह दिखाते हुए कि ईश्वर भी गुरु के आगे शिष्य है। दत्तात्रेय ने पृथ्वी, वायु, मधुमक्खी और वेश्या तक चौबीस गुरुओं से सीखा — यह बताते हुए कि जो सिखाए वही गुरु है। कबीर, नानक और रामकृष्ण की परंपराओं में भी यह दिन उतना ही आदर पाता है।

विधि एवं परंपरा

गुरु के चरणों में पुष्प, फल और वस्त्र अर्पित कर आशीर्वाद लेना; व्यास पूजा और गुरु गीता का पाठ; गुरु परंपरा का स्मरण और दीक्षा ग्रहण; चातुर्मास व्रत का संकल्प; आश्रमों में सत्संग और अन्नदान।

कहाँ मनाया जाता है

सम्पूर्ण भारत और नेपाल — आश्रमों, मठों, संगीत घरानों और विद्यालयों में; बौद्ध परंपरा में आषाढ़ पूर्णिमा या धम्म चक्क पवत्तन दिवस।

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