परिचय
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
जन्माष्टमी विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव है, जिनका जन्म मथुरा के कारागार में कंस के भय के बीच अर्धरात्रि को हुआ। भक्त उपवास रखकर मध्यरात्रि तक जागते हैं और जन्म के क्षण पर शंख, घंटी और कीर्तन से उत्सव मनाते हैं।
उत्पत्ति
कृष्ण जन्म की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध, हरिवंश पुराण और विष्णु पुराण में विस्तार से वर्णित है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का योग जन्म का शास्त्रीय काल माना जाता है, इसीलिए व्रत की तिथि निर्धारण में निशीथ काल देखा जाता है। मथुरा, वृंदावन, गोकुल, नंदगाँव और द्वारका इस पर्व के केंद्र हैं, और उत्तर भारत में मंदिरों में झूला तथा झाँकी की परंपरा सदियों पुरानी है।
क्यों मनाया जाता है
जन्माष्टमी का मूल संदेश गीता के उस वचन में है — जब धर्म क्षीण होता है और अधर्म बढ़ता है, तब ईश्वर स्वयं अवतरित होते हैं। कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ, जो बताता है कि प्रकाश सबसे घने अंधकार में जन्म लेता है। वे बालरूप में माखनचोर, युवा रूप में प्रेम और रास के केंद्र, और कुरुक्षेत्र में गीता के उपदेशक हैं — जीवन के हर भाव में ईश्वर को पाने का मार्ग। मध्यरात्रि तक जागरण भीतर की प्रतीक्षा और सजगता का अभ्यास है।
कथा
मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को आकाशवाणी से ज्ञात हुआ कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका काल होगा। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी एक-एक संतान का वध कर दिया। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र में, आठवें पुत्र का जन्म हुआ। उसी क्षण पहरेदार निद्रा में डूब गए, बेड़ियाँ स्वयं खुल गईं और द्वार अनावृत हो गए। वसुदेव शिशु को लेकर उमड़ती यमुना के तट पर पहुँचे; नदी ने मार्ग दे दिया और शेषनाग ने वर्षा से छाया की। गोकुल में उन्होंने कृष्ण को नंद और यशोदा को सौंपकर उनकी नवजात कन्या — योगमाया — को कारागार लौटा लिया। कंस ने उस कन्या को पटकने का प्रयास किया, पर वह आकाश में देवी रूप में प्रकट होकर बोली कि उसका काल पहले ही सुरक्षित पहुँच चुका है।
कहानियाँ और प्रसंग
गोकुल और वृंदावन की लीलाएँ अनंत हैं। पूतना का वध, शकट भंजन, माखन चोरी और यशोदा का मुख में ब्रह्मांड देखना; कालिय नाग का दमन; ब्रज को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाना; वंशी की धुन पर गोपियों का रास और राधा का अनन्य प्रेम; कंस का वध और माता-पिता की मुक्ति। आगे द्वारका में वे राजा हैं, महाभारत में अर्जुन के सारथी, और कुरुक्षेत्र में गीता के उपदेष्टा — जहाँ वे कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों मार्ग बताते हैं। सुदामा की मुट्ठी भर चावल और विदुर के घर का सादा भोजन बताते हैं कि उन्हें वैभव नहीं, प्रेम प्रिय है। अगले दिन नंदोत्सव में दही-हांडी फोड़ी जाती है, जो गोप-बालकों की उस मस्ती का स्मरण है।
विधि एवं परंपरा
दिन भर उपवास और मध्यरात्रि में पारण; बालगोपाल का पंचामृत तथा गंगाजल से अभिषेक, नए वस्त्र, मुकुट और बंसी; झूला सजाना और झाँकी; माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, पंचामृत और छप्पन भोग; भागवत दशम स्कंध का पाठ, कीर्तन और रासलीला; अगले दिन दही हांडी।
कहाँ मनाया जाता है
सम्पूर्ण भारत — मथुरा, वृंदावन, गोकुल और द्वारका में सबसे भव्य; महाराष्ट्र में दही हांडी; गुजरात में द्वारका उत्सव; मणिपुर, ओडिशा और दक्षिण में गोकुलाष्टमी।

