गीता ज्ञान पर लौटें
श्लोक 13.1
अध्याय 13 · क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग · 01

श्लोक 13.1

श्लोक का मनन

अर्जुन उवाच प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव।।13.1।।


सरल अर्थ

।।13.1।। No Translation

भावा��्थ

यह श्लोक आत्मचिंतन, कर्तव्य और जीवन में सही दृष्टि का मार्ग दिखाता है।

जीवन में उदाहरण

इस शिक्षा को आज के किसी निर्णय में सजगता और करुणा के साथ अपनाएँ।