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श्लोक 7.5
अध्याय 7 · ज्ञान विज्ञान योग · 05

श्लोक 7.5

श्लोक का मनन

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7.5।।


सरल अर्थ

।।7.4 -- 7.5।।  पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो ! इस 'अपरा' प्रकृतिसे भिन्न मेरी जीवरूपा बनी हुुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।

भावा��्थ

यह श्लोक आत्मचिंतन, कर्तव्य और जीवन में सही दृष्टि का मार्ग दिखाता है।

जीवन में उदाहरण

इस शिक्षा को आज के किसी निर्णय में सजगता और करुणा के साथ अपनाएँ।