परिचय
ॐ रामाय नमः
विजयादशमी नवरात्रि के बाद का दसवाँ दिन है, जब राम ने रावण का वध किया और देवी दुर्गा ने महिषासुर का। संध्या को रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।
उत्पत्ति
इस पर्व की दो समानांतर परंपराएँ हैं। उत्तर भारत में यह रामायण के युद्ध कांड से जुड़ा है — नौ दिन देवी की आराधना के बाद दसवें दिन राम ने लंकापति रावण का वध किया। पूर्वी भारत में यह दुर्गा की महिषासुर पर विजय का दिन है, इसलिए दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन इसी दिन होता है। तीसरी परंपरा महाभारत से आती है — अज्ञातवास पूर्ण होने पर पांडवों ने शमी वृक्ष में छिपाए अपने अस्त्र इसी दिन निकाले और अर्जुन ने विराट युद्ध में विजय पाई; इसीलिए इसे शस्त्र पूजन और नए कार्य आरंभ करने का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त माना जाता है।
क्यों मनाया जाता है
दशहरा का अर्थ है दस बुराइयों का हरण। रावण का पुतला बाहर नहीं, भीतर के अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, आलस्य, हिंसा और अन्याय का प्रतीक है — इसीलिए हर वर्ष उसे जलाना पड़ता है, क्योंकि ये प्रवृत्तियाँ भी हर वर्ष लौट आती हैं। यह दिन बताता है कि रावण विद्वान, तपस्वी और शिवभक्त होकर भी केवल एक दोष — अहंकार — के कारण नष्ट हुआ। "विजयादशमी" नाम ही कहता है कि विजय बल की नहीं, धर्म की होती है, और अपराजित काल में आरंभ किया कार्य सफल होता है।
कथा
चौदह वर्ष के वनवास में रावण सीता का हरण कर लंका ले गया। राम ने सुग्रीव से मैत्री की, हनुमान ने समुद्र लाँघकर सीता का पता लगाया, और नल-नील ने सेतु बाँधा। दस दिन के भयंकर युद्ध में मेघनाद, कुंभकर्ण और रावण के समस्त वीर मारे गए। रावण को यह वरदान था कि साधारण अस्त्र से उसकी मृत्यु न हो, और उसके नाभि में अमृत का कुंड था — यह रहस्य उसके धर्मनिष्ठ भाई विभीषण ने राम को बताया। आश्विन शुक्ल दशमी को राम ने ब्रह्मास्त्र से उसकी नाभि भेद दी और रावण गिर पड़ा। मरते समय भी उसने लक्ष्मण को नीति का उपदेश दिया, और राम ने उसका अंतिम संस्कार पूर्ण सम्मान से कराया — यह दिखाते हुए कि शत्रु का भी गुण आदरणीय है।
कहानियाँ और प्रसंग
रावण की कथा चेतावनी भी है — वह वेदों का ज्ञाता, शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता और अद्वितीय तपस्वी था, पर अहंकार ने उसका सारा तप व्यर्थ कर दिया। कुंभकर्ण ने अनुचित पक्ष जानते हुए भी भाई का साथ दिया, और विभीषण ने भाई छोड़कर धर्म चुना — दोनों निष्ठा के दो छोर हैं। महाराष्ट्र में इस दिन शमी और आपटा के पत्ते "सोना" कहकर बाँटे जाते हैं, राजस्थान और उत्तर भारत में शस्त्र पूजन तथा नए वाहन-व्यापार का आरंभ होता है, और कर्नाटक में मैसूर दसरा की भव्य शोभायात्रा निकलती है। कुल्लू का दशहरा दशमी से आरंभ होकर सात दिन चलता है, जिसमें सैकड़ों देवी-देवताओं की पालकियाँ एकत्र होती हैं; बस्तर का दशहरा पचहत्तर दिन तक चलता है। बंगाल में इसी दिन सिंदूर खेला के साथ देवी को विदाई दी जाती है।
विधि एवं परंपरा
शस्त्र, वाहन और औज़ारों का पूजन; शमी और आपटा के पत्तों का आदान-प्रदान; नए कार्य, विद्यारंभ और गृहप्रवेश का शुभारंभ; रामलीला का समापन और रावण दहन; जलेबी, फाफड़ा और गुड़ के पकवान; देवी प्रतिमा का विसर्जन।
कहाँ मनाया जाता है
सम्पूर्ण भारत — उत्तर भारत में रावण दहन, मैसूर और कुल्लू का दसरा प्रसिद्ध, महाराष्ट्र में सोना-पत्र, बंगाल में विजया दशमी और सिंदूर खेला।

